इंसान की ख्वाहिश इस कदर बढ़ती रही सच का दम घुटता रहा झूठ का दामन बढ़ता रहा
कोई वफ़ा काम ना आई बस बेवफाई का दौर चल पढ़ा
मेहनतकश को मिली सुखी रोटी चमचागिरी का दौर चमकता रहा
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